वे करियर के परवान चढ़ने के दिन थे, महत्वाकांक्षाओं को पर लगने के दिन थे। उन दिनों में, वक्त ने हमारे पिंजरे तो खोल दिए थे, लेकिन पंख बांध रखे थे। मुक्त आकाश हमें दिखाई दे रहा था, लेकिन ऊंची उड़ान भरने का सपना मूर्त रूप नहीं ले रहा था। टाइम्स ग्रुप के कोर्स में सेलेक्शन होने के बाद पटना से दिल्ली आकर मैं पत्रकारिता की पढ़ाई पूरी कर चुका था, लेकिन नवभारत टाइम्स में नौकरी का वादा संस्थान ने पूरा नहीं किया। बाकी सभी बैचमेट अलग-अलग संस्थानों में लग चुके थे, मैं अवसर ही तलाश रहा था।
इंटरव्यू की शक्ल में कुछ अवसर दिल्ली में नजर आ रहे थे और नौकरी के आश्वासन के रूप में एक मौका मुंबई में दिख रहा था। संभावनाओं और अनिश्चितताओं से घिरा मैं उस दिन असमंजस की ही स्थिति में मौसी के घर गया, जहां मुझे गौतम भैया मिले। वह उन दिनों आईआईटी दिल्ली से बीटेक कर रहे थे और ज्योतिष का शौक भी रखते थे।
उनसे बातचीत के दौरान मैंने सवाल किया, बताइए क्या मैं मुंबई जाऊंगा, और मेरे उस सवाल के समय की ग्रह-दशाओं के आधार पर उसकी कुंडली बनाने के बाद उन्होंने उत्तर दिया कि तुम मुंबई जाओगे। उन्होंने एक तारीख बताई – 7 अगस्त और कहा कि ‘इसके दो दिन पहले या दो दिन बाद (यानी 5 से 9 अगस्त के बीच) तुम्हें वहां नौकरी मिल जानी चाहिए।‘
आश्चर्य यह कि एक-एक कर दिल्ली वाले सारे प्रस्तावित इंटरव्य स्थगित हो गए और मैं तय कार्यक्रम के मुताबिक 3 अगस्त को मुंबई पहुंच गया जहां पांच अगस्त को इंटरव्यू के बाद छह अगस्त से एक अखबार में काम शुरू कर दिया।
तो क्या मेरा पटना से दिल्ली पहुंचना और फिर दिल्ली से मुंबई जाकर वहां पत्रकारिता करना पहले से तय था? गौतम भैया की भविष्यवाणी के आईने में देखें तो जवाब हां में मिलता है। वरना वह पहले से कैसे बता देते कि मुंबई में फलां तारीख को नौकरी मिल जाएगी? हालांकि मेरे जीवन के बारे में गौतम भैया की ही कुछ और भविष्यवाणियां गलत साबित हुईं।
वाम वैचारिकी से लैस मेरे ज्यादातर दोस्त ज्योतिष संबंधी दावों को फिजूल बताते हैं। लेकिन कुछ बहुत करीब के दोस्तों ने शौकिया तौर पर ज्योतिष की पढ़ाई की है और वे भविष्यवाणियों की दुकान नहीं चलाते, लेकिन ज्योतिष की विश्वसनीयता का यकीन दिलाते हैं।
ये सारी बहसें और यादें तब एक बार फिर ताजा हो उठीं, जब पिछले हफ्ते दिल्ली मेट्रो में अचानक एक मित्र के परिचित ज्योतिष एक्सपर्ट टकरा गए। मित्र ने बताया कि वे अपनी सही भविष्यवाणियों के लिए न केवल मीडिया जगत में बल्कि राजनीतिक हलकों में भी बहुत सम्मानित हैं। मित्र के विश्वास की पुष्टि करने के बाद मेरे संदेह के जवाब में उन्होंने भी वही चर्चित वाक्य दोहराया जो अक्सर सुनने में आता है कि ‘ज्योतिषी फ्रॉड हो सकते हैं, पर ज्योतिष शास्त्र पक्का है।‘
मैं इस तरफ या उस तरफ का कोई निष्कर्ष देने की स्थिति में तब भी नहीं था, अब भी नहीं हूं, लेकिन संदेह की अपनी जमीन छोड़ने को भी तैयार नहीं। इसकी बुनियाद यह सवाल है कि जितने भी फ्रॉड ज्योतिषी हों, उन्हें छोड़िए, यह बताइए कि ज्योतिष शास्त्र क्या हमारे भविष्य को बिल्कुल तय मानता है? अगर भविष्य पूरी तरह तय है तो फिर हमारे या किसी के भी प्रयासों का क्या मतलब बनता है?
फिर तरह-तरह के उपायों से ग्रह-दशा को ठीक करने, अंगूठियों-पत्थरों के जरिए भावी आपदा को टालने की बात भी कैसे होती है? अगर आप किसी उपाय से किसी आपदा को टाल सकते हैं तो फिर यह कैसे माना जाए कि भविष्य निश्चित है?
और अगर यह थोड़ा निश्चित और थोड़ा अनिश्चित है तो फिर यह कैसे तय हो कि क्या निश्चित है और क्या अनिश्चित। अगर यह मानें कि सागर में तूफान का आना निश्चित है पर हमारा डूबना या बचना अनिश्चित तो फिर भविष्यवाणियों में फंसने से अच्छा तो शायद यह है कि तूफान से निपटने की तैयारी की जाए और नाव पलटने की भी स्थिति में ज्योतिषी को याद करने के बजाय करीब से गुजरते किसी तख्ते का सहारा लेने के लिए हाथ-पांव मारा जाए, नहीं?
(रेखाचित्र प्रतीकात्मक : एआई की मदद से)
(प्रणव प्रियदर्शी ‘जनसत्ता’, ‘लोकमत समाचार’ और ‘नवभारत टाइम्स’ में लंबी पत्रकारीय पारी के बाद फ़िलहाल स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं।)